Hindi Essay “Yugpurush Madan Mohan Malaviya” Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and other Classes Exams.

युगपुरुष मदन मोहन मालवीय

Yugpurush Madan Mohan Malaviya

उन्ही में से एक महापुरूष, अपनी विद्वता, शालीनता, और विनम्रता की असाधारण छवी के कारण जन-जन के नायक थे। अंग्रेज जज तक उनकी तीव्र बुद्धि पर आश्चर्य प्रकट करते थे। अपने जीवन-काल में पत्रकारिता, वकालत, समाज-सुधार, मातृ-भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले महामना, मदन मोहन मालवीय जी इस युग के आदर्श पुरुष थे। उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिए तैयार करने की थी, जो देश का मस्तक गौरव से ऊचा कर सकें।

ऐसी महान विभूती पंडित महामना मदनमोहन मालवीय का जन्म भारत के उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद शहर में २५ दिसम्बर सन १८६१ को एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे, अतः मालवीय कहलाए। राष्ट्रीय नेताओं में अग्रणी मालवीय जी को शिक्षक वर्ग भी श्रद्धा और आदर से आज भी याद करते हैं।

मालवीय जी ने सन् 1893 में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। ‘‘वकालत के क्षेत्र में मालवीयजी की सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फाँसी से बचा लेने की थी। । चौरी-चौरा कांड के 170 भारतीयों को फाँसी की सजा सुनाई गई थी, किंतु मालवीय जी के बुद्धि-कौशल ने अपनी योग्यता और तर्क के बल पर 151 लोगों को फाँसी से छुड़ा लिया था। देश में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में इस अद्भुत केस की ख्याती फैल गई।

राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए और भारतीय संस्कृति की जीवंतता को बनाए रखने के लिए मालवीयजी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की।’’मालवीय जी का विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है, जब वहाँ के निवासी सुशिक्षित हों। बिना शिक्षा के मनुष्य पशुवत् माना जाता है। मालवीय जी नगर-नगर की गलियों तथा गाँवों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार में जुटे थे। वे जानते थे की व्यक्ति अपने अधिकारों को तभी भली भाँति समझ सकता है, जब वह शिक्षित हो। संसार के जो राष्ट्र आज उन्नति के शिखर पर हैं, वे शिक्षा के कारण ही हैं।

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ऐसा कहा जाता है कि, पं. मदनमोहन मालवीय जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प जब कुंभ मेले में त्रिवेणी संगम पर भारत भर से आयी जनता के बीच दोहराया तभी वहीं एक वृद्धा ने मालवीय जी को इस कार्य के लिए सर्वप्रथम एक पैसा चंदे के रूप में दिया था।

विश्वविद्यालय के निर्माण के समय पं. मदन मोहन मालवीय जी के जीवन में एक खास घटना हुई, जब दान के लिये मालवीय जी हैदराबाद के निजाम के पास गये तो, निजाम ने मदद करने से साफ इंकार कर दिया। मगर मालवीय जी इतनी जल्दी हार मानने वाले इंसान तो थे नही। वो उचित क्षणं का इंतजार कर रहे थे।

इत्तफाक से उसी समय एक सेठ का निधन हो गया। शव-यात्रा में घर वाले पैसों की वर्षा करते हुए चल रहे थे। तभी मालवीय जी को एक उपाय सुझा और वो भी शव-यात्रा में शामिल हो गये तथा पैसा बटोरने लगे। महामना को ऐसा करते देख सभी को आश्चर्य हुआ, तभी एक व्यक्ति ने पूछ ही लिया कि “आप ये क्या कर रहे हैं!” ऐसा सुनते ही मालवीय जी ने कहा “भाई क्या करु ? तुम्हारे निजाम ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया और जब खाली हाँथ बनारस लौटूँगा तो लोगों के पूछने पर कि हैदराबाद से क्या लाये तो क्या कहूँगा कि खाली हाँथ लौट आया? भाई, निजाम का दान न सही, शव-विमान का ही सही।“

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ये बात जब निजाम को पता चली वो बहुत शर्मिदा हुआ और महामना से माफी माँगते हुए विश्वविद्यालय के लिये काफी अनुदान दिया। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि मालवीय जी के मृदव्यवहार एवं दृणइच्छा शक्ती का ही परिणाम है, काशी हिंदू विश्वविद्यालय। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी अपनी भूमिका निभा चुका है। विश्व में अपनी श्रेष्ठ पहचान लिये काशी हिन्दु विश्वविद्यालय भारत का गौरव है। श्री सुंदरलाल, पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. एस. राधाकृष्णन् (भूतपूर्व राष्ट्रपति), डॉ. अमरनाथ झा, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉ. रामस्वामी अय्यर, डॉ. त्रिगुण सेन (भूतपूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री) जैसे विद्वान यहाँ के कुलपति रह चुके हैं।

मालवीय जी संस्कृत, हिंदी तथा अंग्रेजी तीनों ही भाषाओं के ज्ञाता थे। महामना जी का जीवन विद्यार्थियों के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत है। जनसाधारण में वे अपने सरल स्वभाव के कारण प्रिय थे, कोई भी उनके साथ बात कर सकता था। मानों वे उनके पिता, बन्धु अथवा मित्र हों।

मित्रों, महामना जी के जीवन की एक घटना आपको बताना चाहेंगे-

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के कुछ ही समय की बात है, यदा-कदा अध्यापक उद्दंड छात्रों को उनकी गलतियों के लिए आर्थिक दंड दे दिया करते थे, मगर छात्र उस दंड को माफ कराने मालवीय जी के पास पहुंच जाते और महामना उसे माफ भी कर देते थे। यह बात शिक्षकों को अच्छी नहीं लगी और वह मालवीय जी के पास जाकर बोले, ‘महामना, आप उद्दंड छात्रों का आर्थिक दंड माफ कर उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं। इससे उनमें अनुशासनहीनता बढ़ती है। इससे बुराई को बढ़ावा मिलता है। आप अनुशासन बनाए रखने के लिए उनके दंड माफ न करें।’

मालवीय जी ने शिक्षकों की बातें ध्यान से सुनीं फिर बोले, ‘मित्रो, जब मैं प्रथम वर्ष का छात्र था तो एक दिन गंदे कपड़े पहनने के कारण मुझ पर छह पैसे का अर्थ दंड लगाया गया था। आप सोचिए, उन दिनों मुझ जैसे छात्रों के पास दो पैसे साबुन के लिए नहीं होते थे तो दंड देने के लिए छह पैसे कहां से लाता। इस दंड की पूर्ति किस प्रकार की, यह याद करते हुए मेरे हाथ स्वत: छात्रों के प्रार्थना पत्र पर क्षमा लिख देते हैं।’ शिक्षक निरुत्तर हो गए।

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गाँधी जी मालवीय जी को नवरत्न कहते थे और अपने को उनका पुजारी। महामना जी, को छात्रों के साथ तो लगाव था ही। इसके अलावा विश्वविद्यालय से भी बहुत लगाव था। एक बार की बात है कि, महामना जी, छात्रावास का निरीक्षण कर रहे थे तभी उन्होने देखा कि एक छात्र ने दिवार के कोने में कुछ लिख रखा था।

मालवीय जी ने उसे समझाया-“ मेरे दिल में तुम्हारे प्रति जितनी ममता और लगाव है, उतना ही लगाव विश्वविद्यालय की प्रत्येक ईंट से है। मैं आशा करता हुँ कि भविष्य में तुम ऐसी गलती फिर न करोगे।“

तद्पश्चात महामना जी ने जेब से रूमाल निकालकर दिवार को साफ कर दिया। विश्वविद्यालय के प्रति मालवीय जी के दृष्टीकोण को जानकर छात्र लज्जा से झुक गया।

मित्रों, कितनी शालीनता से महामना जी ने उस छात्र को बिना सजा दिये उसके मन में सभी के प्रति आदर का भाव जगा दिया। यकीनन दोस्तों, यदि आज हम महामना मालवीय जी के आचरण को जीवन में आपना लें तो स्वयं के साथ समाज को भी सभ्य और सुन्दर बना सकते हैं। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी का विद्यार्थियों को दिये उपदेश के साथ कलम को विराम देते हैं।

सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाथ विद्यया।

देशभक्त्याऽत्यागेन सम्मानर्ह: सदाभव।।

अथार्त सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या, देशभक्ति, आत्मत्याग द्वारा अपने समाज में सम्मान के योग्य बनो।

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