सारी रैन जागते बीती
Sari ren jagte biti
असगुन के उल्कापातों में
सारी रैन जागते बीती
जो दिन उजले चंदन चर्चित
उसके लिए उपस्थिति वर्जित
हुईं कोयला स्वर्ण गिन्नियाँ
कालिख हुई थैलियाँ अर्जित
तीते रहे निबौरी सपने
मधु में उम्र पागते बीती
यह बेमेल संग की छाया
चमकाती है दुख की छाया
उतना ही बाँधे रखती है
जितना ही खुलती है माया
टाट लगे उखड़े मलमल को
सारी उम्र तागते बीती
प्यासे पाषाणों का होकर
लुप्त हो गया कोई निर्झर
उसके राग हुए वैरागी
जो ऐसी धारा पर निर्भर
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बंद बाँसुरी की सुरंग में
विह्वल सांस भागते बीती
