Hindi Short Story and Hindi Moral Story on “Dharmbudhi Aur Papbudhi” , “धर्मबुद्धि और पापबुद्धि” Hindi Prernadayak Story for Class 9, Class 10 and Class 12.

धर्मबुद्धि और पापबुद्धि

Dharmbudhi Aur Papbudhi

 

 

किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे| एक बार पापबुद्धि ने विचार किया कि वह तो मुर्ख भी है ओर दरिद्र भी| क्यों न किसी दिन धर्मबुद्धि को साथ लेकर विदेश जाया जाए| इसके प्रभाव से धान कमाकर फिर किसी दिन इसको भी ठगकर सारा धन हड़प कर लिया जाए|

 

यह विचारक वह अगले ही दिन धर्मबुद्धि के पास जाकर कहने लगा, मित्र! वृद्धावस्था में तुम जब अपने नाती-पोतों के पास बैठकर बातें करोगे? तो, अपनी कौन सी कारस्तानी का बखान करोगे? तो, अपनी कौन सी कारस्तानी का बखान करोगे? न तुम कभी विदेश गए और न वहां की वस्तुएं देखी और देखने योग्य स्थान ही देखें| कहते हैं कि इस पृथ्वी पर रहे जिसने विदेश-भ्रमण नहीं किया, अनेक देशों की जानकर प्राप्त नहीं की, उसका तो जन्म ही व्यर्थ है|’

 

धर्मबुद्धि को पापबुद्धि का परामर्धा भा गया| उसने भी अपने गुरुजनों और परिजनों से एक दिन आज्ञा ली ओर वह पापबुद्धि के साथ विदेश-भ्रमण के लिए निकल पड़ा| इस प्रकार विदेश जाकर दोनों ने खूब धन कमाया| फिर वे अपने घर की ओर वापस चल पड़े| वापस लौटते हुए उन्हें वह दूरी खटक रही थी|

 

जब वे अपने नगर के निकट आ गए तो पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा, मित्र! मैं समझता हूं कि इस सम्पूर्ण धन को लेकर घर जाना ठीक नहीं रहेगा| इतना धन देखकर सभी हमसे मांगने लग जाएंगे| अच्छा यही होगा कि अधिक धन यहीं कहीं जंगल में छिपाकर रख दिया जाए और थोड़ा सा लेकर घर जाया जाए| जब कभी आवश्यकता हुई तो उसके अनुसार धन यहां से निकालकर ले जाएंगे|

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धर्मबुद्धि बोला, ‘यदि तुम यह ठीक समझते हो तो यही करो|’

 

एक स्थान पर धन गाड़ दिया गया| फिर कुछ धन लेकर वे दोनों अपने-अपने घर जा पहुंचे अपने घर जाकर दोनों मित्रों के दिन सुख से कटने लगे| पापबुद्धि के मन में पाप था| एक दिन अवसर पाकर वह अकेला वन में आया और सारा धन निकालकर ले गया| गड्डे को उसने उसी प्रकार ढक दिया|

 

एक दिन पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के पास जाकर कहा, ‘मित्र! मेरा धन तो समाप्त हो गया है अत: यदि तुम कहो तो उस स्थान पर चलकर कुछ और धन निकालकर ले आएं?’

 

धर्मबुद्धि चलने को तैयार हो गया|

 

वहां जाकर जब स्थान को खोदा तो जिस पात्र में धन रखा था वह खाली पाया| पापबुद्धि ने वहीं पर अपना सर पीटना आरम्भ कर दिया| उसने धर्मबुद्धि पर आरोप लगाया कि उसने हि वह धन चुरा लिया है, नहीं तो उस स्थान पर उस धन के बारे में उसके अतिरिक्त और कौन जाता था| उसने कहा कि वह जो धन लेकर गया है| उसका आधा भाग उसको दे दे| अन्यथा वह राजा के पास जाकर निवेदन करेगा|

 

धर्मबुद्धि को यह सुनकर क्रोध आ गया| उसने कहा ‘मेरा नाम धर्मबुद्धि है, मेरे सम्मुख इस प्रकार की बात कभी नही कहना| मैं इस प्रकार की चोरी करना पाप समझता हूं|’

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किन्तु विवाद बढ़ गया| दोनों व्यक्ति न्यायलय में चले गए| वहां भी दोनों परस्पर आरोप-प्रत्योरोप करके एक-दूसरे को दोषी सिद्ध करने लगे| न्यायधीशों ने जब सत्य जानने के लिये दिव्य परीक्षा का निर्णय दिया तो पापबुद्धि बोल उठा, ‘यह उचित न्याय नहीं है| सर्वप्रथम लेख बद्ध प्रमाणों को देखना चाहिए, उसके अभाव में साक्षी ली जाती है और जब साक्षी भी न मिले तो फिर दिव्य परीक्षा ही की जाती है| मेरे इस विवाद में अभी वृक्ष देवता साक्षी है| वे इसका निर्णय कर देंगे|’

 

न्यायधीशों ने कहा, ‘ठीक है, ऐसा ही कर लेते हैं|

 

इस प्रकार अगले दिन प्रात:काल उस वृक्ष को समीप जाने का निश्चय कर लिया गया| उन दोनों को भी साथ चलने के लिए कहा गया|

 

न्यायलय से लौटकर पापबुद्धि घर आया और उसने अपने पिता से कहा, ‘पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का सारा धन चुरा लिया है| अब मामला न्यायलय में चला गया है| यदि आप मेरी सहायता करें तो मैं बच सकता हूं, अन्यथा हमारे प्राण जाने का भी भय है|’

 

‘जैसा पुत्र वैसा ही पिता|’ उसने कहा, ‘हां हां बताओ, किस प्रकार वह धन हथियाया जा सकता है?

 

पापबुद्धि ने अपनी योजना अपने पिता को बता दी| उसके अनुसार उसका पिता वृक्ष के एक कोटर में जाकर बैठ गया| दूसरे दिन प्रात:काल यथासमय पापबुद्धि न्यायधीशों तथा धर्मबुद्धि को लेकर उस स्थान पर गया जहां धन गाड़ कर रखा गया था| वहां पहुंचकर पापबुद्धि ने घोषणा की, समस्त देवगण मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं| ‘हे भगवती वनदेवी| हम दोनों में से जो चोर हो आप उनका नाम बता दीजिए|’

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कोटरे में छिपे पापबुद्धि के पिता ने यह सुनकर कहा, ‘सज्जनों! आप ध्यानपूर्वक सुनिए| उस धन को धर्मबुद्धि ने ही चुराया|’

 

यह सुनकर सबको आश्चर्य हुआ| तब धर्मबुद्धि के इस अपराध के लिए इसके दण्ड का विधान देखा जाने लगा| अवसर पाकर धर्मबुद्धि ने इधर उधर से घास-फूस एकत्रित की, कुछ लकड़ियां भी चुनी और वह सब कोटरे में डालकर आग लगा दी|

 

जब वह जलने लगा तो कुछ समय तक तो पापबुद्धि का पिता यह सब सहन करता रहा| किन्तु जब असहाय हो गया तो वह अपना अधजला शरीर और फूटी आंख लेकर उस कोटरे से बाहर निकल आया| उसे देखकर न्यायधीशों ने कहा, ‘आप कौन हैं ओर आपकी यह दशा किस प्रकार हुई?’

 

पापबुद्धि का पिता अब किसी प्रकार भी अपनी बात को छिपाकर रखने में असमर्थ था| उसने सारा वृतान्त आद्योपान्त यथावत् सुना दिया| न्यायधीशों ने जो दण्ड-व्यवस्था धर्मबुद्धि के लिए निश्चय की थी| वह पापबुद्धि पर लागू कर उसको उसी वृक्ष पर लटका दिया|

 

धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हुए न्यायधीशों ने कहा, ‘चतुर व्यक्ति को उपाय के साथ ही उपाय भी सोच लेना चाहिए| लाभ और हानि इन दोनों पक्षों पर विचार न करने पर एक मुर्ख बगुले की समझ ही उसके सभी अनुयायियों को नेवले ने मार डाला|

 

 

 

 

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