घमंडी कौवा Ghamandi Kova हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था , उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था . …
कवि वही Kavi vahi कवि वही जो अकथनीय कहे किंतु सारी मुखरता के बीच मौन रहे शब्द गूँथे स्वयं अपने गूथने पर कभी रीझे कभी खीझे कभी बोल …
याद आई पृथ्वी Yaad aai prithvi मैं उठा और उठता चला गया जैसे कि तूफान! जा लगा उस सीने से बेहद करीबी अपने सीने से जो था ही नहीं, …
खिली सरसो Khili sarso खिली सरसों, आँख के उस पार, कितने मील पीले हो गए? अंकुरों में फूट उठता हर्ष, डूब कर उन्माद में प्रतिवर्ष, पूछता है प्रश्न …
सांझ(कविता) Saanjh kavita जिस दिन से संज्ञा आई छा गई उदासी मन में, ऊषा के दृग खुलते ही हो गई सांझ जीवन में। मुँह उतर गया है दिन …
सुना है कभी तुमने रंगों को Suna he kabhi tumne rango ko कभी-कभी उजाले का आभास अंधेरे के इतने क़रीब होता है कि दोनों को अलग-अलग पहचान पाना …
बथुए की पत्ती, मूंगे जैसी बाल Bathuye ki patti, munge jesi bal पौधों में उभरा सीताओं का रूप पछुआ के झोंकों से हिल उठती धूप बैंगनी-सफ़ेद बूटियों की …
घाटी की चिन्ता Ghati ki chinta सरिता जल में पैर डाल कर आँखें मूंदे, शीश झुकाए सोच रही है कब से बादल ओढ़े घाटी। कितने तीखे अनुतापों को …