Ancient India History Notes on “History of Delhi”, “दिल्ली का इतिहास” History notes in Hindi for class 9, Class 10, Class 12 and Graduation Classes

दिल्ली का इतिहास

History of Delhi

दिल्ली की संसार के प्राचीन नगरों में गणना की जाती है। महाभारत के अनुसार दिल्ली को पहली बार पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम से बसाया था किंतु आधुनिक विद्दानों का मत है कि दिल्ली के आसपास उदाहरणार्थ रोपड़ (पंजाब) के निकट सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्न प्राप्त हुए हैं और पुराने क़िले के निम्नतम खंडहरों में आदिम दिल्ली के अवशेष मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं वास्तव में देश में अपनी मध्यवर्ती स्थिति के कारण तथा उत्तरपश्चिम से भारत के चतुर्दिक भागों को जाने वाले मार्गों के केंद्र पर बसी होने से दिल्ली भारतीय इतिहास में अनेक साम्राज्यों की राजधानी रही है।

पौराणिक उल्लेख

जातकों के अनुसार इंद्रप्रस्थ सात कोस के घेरे में बसा हुआ था। पांडवों के वंशजों की राजधानी इंद्रप्रस्थ में कब तक रही यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता किंतु पुराणों के साक्ष्य के अनुसार परीक्षित तथा जनमेजय के उत्तराधिकारियों ने हस्तिनापुर में भी बहुत समय तक अपनी राजधानी रखी थी और इन्हीं के वंशज निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा में बह जाने पर अपनी नई राजधानी प्रयाग के निकट कौशाम्बी में बनाई मौर्य काल में दिल्ली या इंद्रप्रस्थ का कोई विशेष महत्त्व न था क्योंकि राजनीतिक शक्ति का केंद्र इस समय मगध में था। बौद्ध धर्म का जन्म तथा विकास भी उत्तरी भारत के इसी भाग तथा पाश्रर्ववर्ती प्रदेश में हुआ इसी कारण बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा बढने के साथ ही भारत की राजनीतिक सत्ता भी इसी भाग (पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार) में केंद्रित रही।

ऐतिहासिक उल्लेख

मौर्यकाल के पश्चात लगभग 13 सौ वर्ष तक दिल्ली और उसके आसपास का प्रदेश अपेक्षाकृत महत्त्वहीन बना रहा। हर्ष के साम्राज्य के छिन्न भिन्न होने के पश्चात उत्तरीभारत में अनेक छोटी मोटी राजपूत रियासतें बन गईं और इन्हीं में 12 वीं शती में पृथ्वीराज चौहान की भी एक रियासत थी जिसकी राजधानी दिल्ली बनी। दिल्ली के जिस भाग में क़ुतुब मीनार है वह अथवा महरौली का निकटवर्ती प्रदेश ही पृथ्वीराज के समय की दिल्ली है। वर्तमान जोगमाया का मंदिर मूल रूप से इन्हीं चौहान नरेश का बनवाया हुआ कहा जाता है। एक प्राचीन जनश्रुति के अनुसार चौहानों ने दिल्ली को तोमरों से लिया था जैसा कि 1327 ई. के एक अभिलेख से सूचित होता है यह भी कहा जाता है कि चौथी शती ई. में अनंगपाल तोमर ने दिल्ली की स्थापना की थी। इन्होंने इंद्रप्रस्थ के क़िले के खंडहरों पर ही अपना क़िला बनवाया।

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मुग़ल काल

1526 में भारत के पहले मुग़ल शासक बाबर का प्रवेश हुआ और उसने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। 1530 में उसका बेटा हुमायूँ गद्दी पर बैठा और 10 संघर्षमय वर्षो तक उसने दिल्ली पर राज किया। 1553 में उन्होंने अपने शासन की स्थापना के उपलक्ष्य में नए शहर दीनपनाह का निर्माण किया इसके लिए बड़ी सावधानी से यमुना के किनारे एक स्थान चुना गया। अब इस शहर का नामोनिशान नहीं है। क्योंकि शेरशाह सूरी ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।

अगले दो मुग़ल शासकों अकबर और जहाँगीर ने आगरा को राजधानी बनाकर भारत पर शासन करना पसंद किया लेकिन दिल्ली के महत्त्व को समझकर वे बीच–बीच में दिल्ली आते रहे। 1636 में शाहजहाँ ने अभियंताओं, वास्तुविदों तथा ज्योतिषियों को आगरा व लाहौर के बीच अच्छे जलवायु वाले स्थान के चयन का निर्देश दिया। यमुना के पश्चिमी किनारे पर पुराने क़िले के उत्तर में सुल्तानों की हज़रत दिल्ली का चयन किया गया। शाहजहाँ ने यहाँ उर्दू –ए-मौला नामक एक क़िले को केंद्र में रखकर नई राजधानी का निर्माण शुरू करवाया। लाल क़िले के नाम से विख्यात यह क़िला आठ वर्षो में पूर्ण हुआ और 19 अप्रैल 1648 को शाहजहाँ ने अपनी इस नई राजधानी शाहजहाँनाबाद के क़िले में नदी के सामने वाले द्वार से प्रवेश किया।

लाहौर गेट शाहजहाँनाबाद क़िले का भव्य प्रवेशद्वार है। यहाँ से शहर की प्रमुख सड़क शुरू होकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक जाती है। 36 मीटर चौड़ी यह सड़क शहर की मुख्य धुरी थी रात को बीच के जलाशय पर पड़ती चंद्रमा की रुपहरी रोशनी ने इस स्थान को चांदनी चौक नाम दिया। यह सड़क दिल्ली का सामारोह स्थल थी। शाहजहां और औरंगज़ेब यहाँ अपना शाही जुलूस निकालते थे, नादिरशाह और अहमद शाह अब्दाली विद्रोही घुड़सवार के रूप में निकले थे और मराठा व रोहिल्लाओं ने विजय उल्लास मनाया था।

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ब्रिटिश शासनकाल

1803 में अग्रेज़ शासकों ने जब दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया तब यह वाणिज्य एवं व्यवसाय का प्रमुख केंद्र थी, यद्यपि क़िलाबंद शहर भव्य कितु जीर्ण-शीर्ण गंदी बस्ती में बदल चुका था। चारदीवारी क्षेत्र में लगभग एक लाख तीस हज़ार और उपनगरों में लगभग 20 हज़ार लोग रहते थे। सुरक्षा और स्थान की द्दष्टि से ब्रिटिश कमांडरों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यालय लाल क़िले के आसपास के क्षेत्र में स्थापित किए जो घनी आबादी वाला नहीं था। उत्तरी भाग में रेज़िडेंसी बनाई गई, जहाँ छावनी, अस्तबल, वनस्पति क्षेत्र, शस्त्रागार और बारुद भंडार, सीमा शुल्क कार्यालय एक बैंक दो अस्पताल, कुछ बंगले तथा एक गिरजाघर भी बनाया गया। नई सैन्य ज़रुरतों के हिसाब से क़िलेबंद में कुछ परिर्वतन किए गए।

क़िलेबंद शहर से अधिक क्षेत्र में विस्तृत छावनी को 1828 में पश्चिमोत्तर ‘रिज’ पर स्थानांतरित किया गया। पहाड़ी के एक ऊँचे स्थल पर पारंपरिक एवं गोथिक शैली में वैकल्पिक रेज़िडेंसी का निर्माण किया गया, जिसके पश्चात और भी विशाल मैटकाफ़ हाउस बनाया गया उसका स्वामी बाद में रेज़िडेंट के स्थान पर ‘एजेंट ऑफ़ डेल्ही’ बना। 1840 के दशक में छावनी क्षेत्र के आसपास आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से पृथक आवासीय उपनगर का विकास हुआ, जिसे नागरिक क्षेत्र कहा गया। विलियम फ़्रेज़र तथा चार्ल्स मैटकाफ़ जैसे दिल्ली के प्रारंभिक अंग्रेज़ शासक यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से सम्मोहित थे मुग़ल राजदरबार को पारंपरिक समारोह को मनाने की अनुमति थी तथा बादशाहों के नाम पर सिक्के ढाले जाते थे।

नई राजधानी का शुभारंभ

नई राजधानी का शुभारंभ जनवरी 1931 में हुआ। नई दिल्ली की सड़क योजना ज्योमितिय सौंदर्यशास्त्र की धारणा पर आधारित है। समग्र योजना में राजपथ (किंग्सवे) को मुख्य आधार मानकर बनाई गई षट्भुजों की एक शृंखला और 96 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़के हैं। ये षटकोण तीन मार्गों के बीच स्थित थे जो गवर्नर हाउस से निकलकर ऐतिहासिक जामा मस्जिद, इंद्रप्रस्थ और सफ़दरजग के मक़बरे की ओर जाते थे तथा वर्तमान को अतीत से जोड़ते थे। शहर के आवासीय ढांचे की योजना का उदेश्य निवास की सुविधा को व्यवस्थित करना था। जगह-जगह बाग़-बगीचों का निर्माण भी किया गया।

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राजधानी के सौ वर्ष

ग़ुलामी के दौर में अंग्रेज़ सम्राट जॉर्ज पंचम ने 12 दिसम्बर, 1911 को कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया। इसकी रूपरेखा और निर्माण कार्यों की देखरेख ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुचेंस (लुटियन) ने की थी। एक सौ पचास वर्षों तक कोलकाता के ज़रिये भारत पर शासन करने के बाद अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्य विस्तार के मद्देनजर राजधानी को उत्तर भारत स्थानांतरित कर दिल्ली को नए स्थान के रूप में चुना था तथा यहां नयी राजधानी बनाने का महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया। किंग जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण का उत्सव मनाने और उन्हें भारत का सम्राट स्वीकारने के लिए दिल्ली में आयोजित दरबार में ब्रिटिश भारत के शासक, भारतीय राजकुमार, सामंत, सैनिक और अभिजात्य वर्ग के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे। दरबार के अंतिम चरण में एक अचरज भरी घोषणा की गई। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हॉर्डिंग ने राजा के राज्यारोहण के अवसर पर प्रदत्त उपाधियों और भेंटों की घोषणा के बाद एक दस्तावेज़ सौंपा। अंग्रेज़ राजा ने वक्तव्य पढ़ते हुए राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने, पूर्व और पश्चिम बंगाल को दोबारा एक करने सहित अन्य प्रशासनिक परिवर्तनों की घोषणा की। दिल्ली वालों के लिए यह एक हैरतअंगेज फैसला था, जबकि इस घोषणा ने एक ही झटके में एक सूबे के शहर को एक साम्राज्य की राजधानी में बदल दिया, जबकि 1772 से ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी।

 

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