मुकरियाँ
Mukriyan
सीटी देकर पास बुलावै।
रुपया ले तो निकट बिठावै।।
लै भागै मोहि खेलहिं खेल।
क्यों सखि सज्जन, नहिं सखि रेल।।
सतएँ-अठएँ मा घर आवै।
तरह-तरह की बात सुनावै।।
घर बैठा ही जोड़ै तार।
क्यों सखि सज्जन, नहीं अखबार।।
Read More Hindi Poem of Subhadra Kumari Chauhan “Tum”, “तुम” Complete Poem for Class 10 and Class 12
