कभी पाना मुझे Kabhi pana mujhe तुम अभी आग ही आग मैं बुझता चिराग हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से पकड़ता एक किरण का स्पन्द पानी पर लिखता …
कैसी हवा चली उपवन में Kesi hava chali upvan me कैसी हवा चली उपवन में सहसा कली-कली मुरझाई। ईश्वर नें निश्वास किया या विषधर ने ले ली जमुहाई। …
कमरे में धूप Kamre me dhoop हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही, दीवारें सुनती रहीं। धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही। …
कविता का वह काल पुरुष Kavita ka vah kal purush गरल पिया जीवन भर जिसने, अमृत का रखवाला। कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला । …
जिस समय में Jis samay me जिस समय में सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा है वही समय मेरी प्रतीक्षा में न जाने कब से ठहरा हुआ है! …
कब किसी ने प्यार चाहा Kab kisi ne pyar chaha कब किसी ने प्यार चाहा आवरण में प्यार के, बस, देह का व्यापार चाहा प्रेम अपने ही स्वरस …
घंटी Ghanti फ़ोन की घंटी बजी मैंने कहा- मैं नहीं हूँ और करवट बदल कर सो गया दरवाज़े की घंटी बजी मैंने कहा- मैं नहीं हूँ और करवट बदल …
एक भूल ऐसी जो मेरे जीवन का Ek bhul esi jo mere jeevan ka एक भूल ऐसी जो मेरे जीवन का शृंगार हो गयी। भव-जलनिधि में भटकी नौका …